कांतारा के रक्षक देव - तुलुनाडु की रहस्यमयी परंपरा
Hinduism Nov 13, 2025
भारत की सांस्कृतिक विविधता में एक अनोखी परंपरा है जो दक्षिण भारत के कर्नाटक के तुलुनाडु क्षेत्र में पायी जाती है। यहाँ “कांतारा के रक्षक देव” की पूजा की जाती है — एक ऐसा देव जो प्रकृति, न्याय और संतुलन का प्रतीक है।
कथा की उत्पत्ति
कहा जाता है कि माता पार्वती ने एक छोटे से जंगली सूअर (सुअर) को अपने पास पाला। वह सूअर शरारती था और देवताओं के बगीचों व खेतों में उथल-पुथल मचाने लगा। भगवान शिव क्रोधित होकर उसे मारना चाहते थे, पर माता पार्वती ने कहा —
“यह मेरा पालन-पोषित है, इसे मत मारो।”
तब भगवान शिव ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा —
“तुम पृथ्वी पर देव (रक्षक देव) बनकर जाओगे। प्रकृति, पथ और खेतों की रक्षा करोगे, और लोगों को न्याय दोगे।”
तभी से वह सूअर पंजुरली देव के रूप में पूजित हुआ — जो तुलुनाडु के गाँवों और जंगलों की रक्षा करता है।
भूत कोला परंपरा
हर वर्ष भूत कोला के समय, इन देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। यह सिर्फ नृत्य या अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव होता है। भक्तों का विश्वास होता है कि भूत कोला के समय देव अवतरित होकर लोगों को न्याय देते हैं और मार्गदर्शन करते हैं।
भूत कोला का यह दृश्य कर्नाटक के लोकजीवन, संगीत और धर्म को एक अनोखे रंग में प्रस्तुत करता है — जहाँ कलाकार, गायक, और स्थानीय समुदाय मिलकर इस परंपरा को जिन्दा रखते हैं।
फिल्म और लोकविश्वास
फिल्म “कांतारा” ने इसी लोककथा और भूत कोला परंपरा को बड़े परदे पर दिखाया। यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रकृति, आस्था और न्याय के बीच के गहरे संबंध को भी उजागर करती है।
शिक्षा और संदेश
“कांतारा के रक्षक देव” की परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति का सम्मान और न्याय समाज की नींव हैं। इस कथा के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि पुरानी परंपराएँ न केवल आस्था का हिस्सा हैं, बल्कि पर्यावरण और सामाजिक संतुलन बनाए रखने में भी मदद करती हैं।
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