मेहनत का फल ही असली सुख है
Story Nov 17, 2025
एक गाँव में एक संत अपनी पत्नी के साथ रहते थे। उनके पास थोड़ी-सी जमीन थी, जिससे वे खेती करके अपना जीवन यापन करते थे। खेती से बहुत अधिक आय नहीं होती थी, पर संत हमेशा संतोष से रहते थे।
गाँव वाले कभी-कभी संत की मदद के लिए कुछ न कुछ दान देते थे, लेकिन संत दान स्वीकार नहीं करते थे। वे सामान वापस कर देते और लोगों को धर्म, कर्म और सत्य का ज्ञान देते।
इसी राज्य के राजा का एक पुत्र था। राजा हमेशा सोचता था कि अपने पुत्र को उत्तराधिकारी कैसे बनाए। एक दिन मंत्री ने राजा से कहा कि राज्य में एक संत रहता है, जिसके पास हर समस्या का समाधान है। राजा ने तुरंत संत को राजमहल बुलवाया।
संत की बुद्धिमत्ता सुनने के बाद राजा ने उनसे पूछा—
“महाराज, मैं अपने पुत्र के लिए सबसे योग्य जिम्मेदारियाँ कैसे चुनूँ?”
संत ने उत्तर दिया:
“उत्तराधिकारी चुनना बहुत सरल है—उसे ही राज्य सौंपें जो मेहनती हो और राज्य की भलाई को सबसे पहले चुने।”
राजा को संत की बात समझ आई, और उसकी समस्या दूर हो गई।
राजा ने संत को सोना-चाँदी भेजा
राजा ने अपनी कृतज्ञता दिखाने के लिए मंत्री को आदेश दिया कि संत के घर सोना-चाँदी और कीमती वस्तुएँ भेजी जाएँ। मंत्री ने ढेर सारा सामान संत के घर भेज दिया।
जब संत ने यह सब देखा तो उन्होंने पूछा:
“ये सब किसने भेजा?”
मंत्री ने कहा:
“राजा साहब ने।”
संत ने थोड़ी देर विचार किया और पूरा सामान वापस राजा को भेज दिया।
संत का संदेश
राजा ने आश्चर्य से पूछा:
“आपने यह सब वापस क्यों भेज दिया?”
संत मुस्कुराए और बोले:
“मैं मेहनत करके कमाना ही विश्वास रखता हूँ। दान में मिली चीजों से मन में आलस्य आता है। मेहनत से कमाए धन में ही सुख मिलता है। जो सुख अपने हाथों से कमाए धन में है, वह किसी दान में नहीं मिल सकता।”
राजा संत की बात समझ गए। उन्होंने संत को राज्य का आदर्श समझा और अपने पुत्र को भी मेहनत व सत्य का मार्ग अपनाने का निर्देश दिया।
सीख (Moral)
मेहनत से कमाए धन में ही सच्चा आनंद है।
दान में मिले धन से सुख नहीं, केवल सुविधा मिलती है।
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