नालंदा विश्वविद्यालय: विश्व का पहला रेजिडेंशियल इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी

History Nov 28, 2025

नालंदा विश्वविद्यालय: विश्व का पहला रेजिडेंशियल इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी

भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा ने विश्व को ऐसा ज्ञान दिया जिसे आधुनिक युग भी आज याद रखता है। इसी परंपरा का सबसे भव्य प्रतीक है — नालंदा विश्वविद्यालय, जिसे अक्सर दुनिया का पहला "इंटरनेशनल रेजिडेंशियल विश्वविद्यालय" माना जाता है। नालंदा सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं था; यह ज्ञान, शोध और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक समृद्ध केंद्र था।

नालंदा की स्थापना और इतिहास

नालंदा की स्थापना प्राचीन भारत में गुप्त युग के समय हुई मानी जाती है। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार यह संस्थान प्रमुख रूप से सम्राट कुमारगुप्त (5वीं सदी ई.) के शासनकाल में उभरा। बाद में इस विश्वविद्यालय को हर्षवर्धन और पाल वंश के शासकों के संरक्षण और योगदान से और विकसित किया गया।

क्या था नालंदा का ढाँचा?

  • विशाल पुस्तकालय और स्नातक-अध्ययन कक्ष
  • बहुमंज़िला छात्रावास जहां हजारों विद्यार्थी रहते थे
  • अध्यापक/आचार्यों के लिए विशिष्ट वास स्थान
  • धार्मिक और गैर-धार्मिक दोनों विषयों का अध्ययन

प्रमुख शैक्षणिक विषय

  • बौद्ध धर्म और दर्शन
  • गणित एवं खगोल विज्ञान
  • चिकित्सा (आयुर्वेद) और तंत्र
  • भाषा-विज्ञान (संस्कृत, पाली) और साहित्य

छात्र जीवन और वैश्विक प्रभाव

नालंदा में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या प्राचीन टिप्पणियों में काफी अधिक बताई जाती है — लगभग 10,000 से अधिक छात्र और 2,000 से अधिक शिक्षक होते थे। चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत और दक्षिण-पूर्वी एशिया से छात्र यहाँ अध्ययन करने आते थे। प्रवेश प्रतियोगी और कठिन था — छात्रों को आचार्य के सामने परीक्षा देनी पड़ती थी।

नालंदा केवल शिक्षा का केन्द्र नहीं था—यह अंतरराष्ट्रीय ज्ञान-निष्पादन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केन्द्र था।

नालंदा का ग्रंथालय — तीन महान भंडार

इतिहास में नालंदा के पुस्तकालयों का विशेष स्थान रहा है। इनका वर्णन ‘धरणी’, ‘वज्रपर्णी’ और ‘रत्नोदधी’ जैसे नामों से मिलता है — जहाँ विस्तृत धार्मिक, वैज्ञानिक और दुर्लभ ग्रंथों का समाहार था। पुरातात्विक और ऐतिहासिक स्रोत यह बताते हैं कि पुस्तकालय के जला दिए जाने के कारण असंख्य पांडुलिपियाँ नष्ट हो गईं।

नुकसान और विनाश

1193 ईस्वी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने नालंदा पर आक्रमण किया और इसे जला दिया। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार पुस्तकालय, छात्रावास और अध्ययन कक्षों को नष्ट कर दिया गया; हजारों विद्यार्थी और साधक मारे गए या भाग गए। यह भारतीय शिक्षा एवं पांडुलिपि इतिहास की एक बहुत बड़ी क्षति थी।

रोचक तथ्य: कुछ इतिहासकारों का कहना है कि नालंदा के पुस्तकालय की आग इतनी भयंकर थी कि वहाँ रखी पांडुलिपियाँ महीनों तक जलती रहीं।

आधुनिक नालंदा — पुनर्जीवित विश्वविद्यालय (2014)

2014 में भारतीय सरकार और कई अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के सहयोग से नालंदा विश्वविद्यालय को राजगीर (बिहार) में पुनः स्थापित किया गया। आधुनिक नालंदा सेंटर अब भी शोध, वैश्विक संवाद, सामुदायिक विकास और पारंपरिक के साथ समकालीन विषयों पर शिक्षा प्रदान कर रहा है।

नालंदा का महत्व आज

  • विश्व की शिक्षा-परंपरा में नालंदा का स्थान अद्वितीय है।
  • यह बहु-विषयक अध्ययन और शोध का एक प्राचीन उदाहरण है।
  • नालंदा की कहानी हमारी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत की याद दिलाती है।

निष्कर्ष

नालंदा विश्वविद्यालय हमारे इतिहास में ज्ञान के प्रकाश का एक स्थायी प्रतीक है। उसकी उपलब्धियाँ, त्रासद विनाश और आधुनिक पुनरुद्धार—सब मिलकर हमें यह सिखाते हैं कि शिक्षा और शोध की परंपरा को सुरक्षित रखना कितनी महत्वपूर्ण है।


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