आज के दौर में किसी भी देश की तरक्की इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पास ऊर्जा (Energy) के कितने स्रोत हैं। भारत जैसे तेजी से बढ़ते देश के लिए बिजली की मांग को पूरा करना एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में ‘थोरियम’ (Thorium) एक ऐसा नाम है जो भारत की तकदीर बदल सकता है।
अक्सर हम परमाणु ऊर्जा के लिए ‘यूरेनियम’ का नाम सुनते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के पास यूरेनियम से कहीं ज्यादा कीमती और सुरक्षित ईंधन का खजाना मौजूद है? आज gyan4u.blog के इस खास लेख में हम जानेंगे थोरियम के बारे में सब कुछ—इसका इतिहास, भारत की उपलब्धियां और हमारे देश में इसके विशाल भंडार।
थोरियम का नाम कैसे पड़ा? (History of Thorium)
थोरियम की खोज सन 1828 में स्वीडिश केमिस्ट जोंस जैकब बर्ज़ेलियस ने की थी। उन्होंने इस तत्व का नाम नॉर्वे के पौराणिक कथाओं (Norse Mythology) के मशहूर देवता ‘थॉर’ (Thor) के नाम पर रखा था। थॉर को बिजली और तूफान का देवता माना जाता है, जो असीम शक्ति का प्रतीक हैं। ठीक उसी तरह, थोरियम भी ऊर्जा का एक असीमित स्रोत है, इसीलिए यह नाम इस धातु के लिए एकदम सटीक बैठता है।
भारत में थोरियम कहाँ पाया जाता है?
भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहाँ थोरियम का भंडार प्रचुर मात्रा में है। भारत में थोरियम सीधे धातु के रूप में नहीं मिलता, बल्कि यह ‘मोनाज़ाइट’ (Monazite) नामक खनिज की रेत में पाया जाता है।
भारत के इन राज्यों में थोरियम के सबसे बड़े भंडार हैं:
आंध्र प्रदेश: यहाँ के तटीय इलाकों में थोरियम का सबसे बड़ा भंडार पाया जाता है।
ओडिशा: गंजम और पुरी के समुद्र तटों की रेत मोनाज़ाइट से भरपूर है।
केरल: यहाँ के कोल्लम जिले के तटों पर दुनिया का सबसे अच्छी गुणवत्ता वाला थोरियम मिलता है।
तमिलनाडु: कन्याकुमारी और इसके आसपास के तटीय क्षेत्रों में इसके बड़े निक्षेप मौजूद हैं।
दुनिया का कितना प्रतिशत थोरियम भारत में है?
पूरी दुनिया की नजरें भारत के समुद्र तटों पर इसलिए टिकी हैं क्योंकि भारत के पास दुनिया के कुल थोरियम भंडार का लगभग 25% से 30% हिस्सा है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में करीब 10.7 लाख टन थोरियम मौजूद है। यह भंडार इतना विशाल है कि अगर भारत इसे पूरी तरह इस्तेमाल करना सीख जाए, तो हम अगले 400 से 500 सालों तक बिना किसी प्रदूषण के पूरे देश को सस्ती बिजली दे सकते हैं।
भारत की बड़ी उपलब्धि: थोरियम मिशन में हम कहाँ पहुंचे?
भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने दशकों पहले एक ‘थ्री-स्टेज’ (Three-Stage Nuclear Power Programme) योजना बनाई थी। भारत ने हाल के वर्षों में इस दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं:
KAMINI रिएक्टर की सफलता: तमिलनाडु के कलपक्कम में भारत ने ‘कामिनी’ (KAMINI) नाम का एक छोटा रिएक्टर बनाया है। यह दुनिया का इकलौता ऐसा चालू रिएक्टर है जो थोरियम से निकले ईंधन (Uranium-233) का उपयोग करता है। यह तकनीक दुनिया के किसी और देश के पास नहीं है।
PFBR का सफल परीक्षण: मार्च 2024 में भारत ने कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के कोर लोडिंग की शुरुआत की है। यह भारत के परमाणु कार्यक्रम का दूसरा चरण है। इसकी खास बात यह है कि यह रिएक्टर जितना ईंधन खर्च करेगा, उससे ज्यादा ईंधन खुद पैदा करेगा। यही रिएक्टर भविष्य में थोरियम को बिजली बनाने लायक ईंधन में बदलेगा।
स्वदेशी तकनीक: भारत ने बिना किसी बाहरी मदद के पूरी तरह से स्वदेशी ‘एडवांस हेवी वाटर रिएक्टर’ (AHWR) का डिजाइन तैयार किया है। यह दुनिया को दिखाने के लिए काफी है कि भारत अब थोरियम तकनीक में ‘ग्लोबल लीडर’ बनने की कगार पर है।
ताज़ा अपडेट: भारत की ऐतिहासिक जीत (7 अप्रैल 2026)
7 अप्रैल 2026 को भारत ने अपने परमाणु मिशन में एक ऐसी कामयाबी हासिल की है, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। कलपक्कम में स्थित 500 मेगावाट के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने सफलतापूर्वक “फर्स्ट क्रिटिकलिटी” (यानी नियंत्रित परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया/Controlled Chain Reaction) हासिल कर ली है। यह उपलब्धि भारत को थोरियम युग की ओर ले जाने वाला सबसे बड़ा कदम है।
इस उपलब्धि के मुख्य बिंदु:
स्टेज-3 का रास्ता साफ: यह सफलता भारत को उसके विशाल थोरियम भंडार (दुनिया का 25% से अधिक) के उपयोग के बेहद करीब ले आई है। इससे भारत परमाणु ईंधन के मामले में पूरी तरह ‘आत्मनिर्भर’ हो जाएगा और हमें बाहरी देशों से यूरेनियम खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
ईंधन बनाने वाला रिएक्टर (Breeding Technology): यह रिएक्टर अपनी तरह का अनोखा है क्योंकि यह जितना ईंधन इस्तेमाल करेगा, उससे कहीं ज्यादा ईंधन ‘बनाएगा’ (Breed करेगा)। शुरुआत में यह प्लूटोनियम-यूरेनियम मिश्रण का उपयोग करेगा, लेकिन भविष्य में यह थोरियम को बिजली पैदा करने वाले ‘यूरेनियम-233’ में बदल देगा।
स्वदेशी ताकत (Atmanirbhar Bharat): इस पूरे रिएक्टर की डिजाइनिंग, तकनीक और निर्माण भारत में ही किया गया है। यह “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” का अब तक का सबसे बड़ा उदाहरण है।
भविष्य का लक्ष्य: इस कामयाबी के साथ अब भारत 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन और 2070 तक ‘नेट-जीरो उत्सर्जन’ (प्रदूषण मुक्त भारत) के लक्ष्य की ओर मजबूती से बढ़ रहा है।
थोरियम, यूरेनियम से बेहतर क्यों है?
सुरक्षा: थोरियम रिएक्टरों में यूरेनियम की तुलना में ‘मेल्टडाउन’ (विस्फोट) होने का खतरा लगभग शून्य होता है।
कम परमाणु कचरा: थोरियम से निकलने वाला कचरा यूरेनियम के मुकाबले बहुत कम रेडियोएक्टिव होता है और जल्दी खत्म हो जाता है।
हथियार का डर नहीं: थोरियम से परमाणु बम बनाना बहुत मुश्किल है, इसलिए इसे केवल शांतिपूर्ण कार्यों के लिए इस्तेमाल करना आसान है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. क्या थोरियम सीधे बिजली बना सकता है?
नहीं, थोरियम खुद ‘विखंडन योग्य’ (fissile) नहीं है। इसे पहले एक रिएक्टर में डालकर ‘यूरेनियम-233’ में बदला जाता है, उसके बाद इससे बिजली बनाई जाती है।
Q2. क्या भारत थोरियम तकनीक में दुनिया में नंबर वन है?
जी हाँ, थोरियम आधारित परमाणु अनुसंधान में भारत आज दुनिया के सबसे उन्नत देशों में गिना जाता है।
Q3. भारत में थोरियम की खोज किसने की थी?
भारत के थोरियम भंडार और इसके उपयोग की योजना का श्रेय मुख्य रूप से डॉ. होमी जहांगीर भाभा को जाता है।
Q4. थोरियम किस खनिज से निकलता है?
यह ‘मोनाज़ाइट’ (Monazite) रेत से निकाला जाता है।
Q5. क्या थोरियम से बिजली बनाना महंगा है?
फिलहाल इसकी शुरुआती तकनीक और सेटअप में निवेश अधिक है, लेकिन एक बार चालू होने के बाद यह यूरेनियम और कोयले के मुकाबले बहुत सस्ता और टिकाऊ स्रोत साबित होगा।
निष्कर्ष (Conclusion)
थोरियम भारत के लिए केवल एक धातु नहीं, बल्कि भविष्य की ‘ऊर्जा स्वतंत्रता’ की चाबी है। जिस दिन भारत थोरियम से बड़े पैमाने पर बिजली बनाना शुरू कर देगा, उस दिन हमें न तो कोयले की जरूरत होगी और न ही दूसरे देशों से महंगे तेल या यूरेनियम खरीदने की। gyan4u.blog के इस लेख से स्पष्ट है कि हमारे वैज्ञानिक इस लक्ष्य के बहुत करीब पहुंच चुके हैं।

